जीवन एक अनवरत यात्रा है। जन्म से लेकर मृत्यु तक, पड़ाव अनेकों है, गुजरना पड़ता है हमें। दुःख के साथ सुख के बादलों से भी, और मृत्यु के मरुस्थल में भी। नहीं है विश्वास पल भर का।
हमने खुद बोया है कष्ट, प्रताड़ना और पीड़ा का विष वृक्ष। भोगना हमें ही पड़ेगा। ढूँढते हैं कहाँ जीवन में। अरे, वो तो एक छलावा है। एक मृग तृष्णा है।
ज्ञात है हर किसी को, शरीर नहीं है जीवन। और नहीं है मन भी, नहीं कह सकते आत्मा को जीवन।
हज़ारों जन्म लेने पड़ेंगे, जीवन को समझने में। मृत्यु नहीं है जीवन का अंत! वह है कुछ दिनों का विश्राम स्थल। फिर चलना पड़ता है हमें, नये क्षितिज की ओर। जन्म मरण के बंधन से मुक्त होकर।
Courtesy: Dr Sujiv Sanyal ( from Bakhri Bazar, Begusarai, Bihar) wrote this on 18th March 2009. He is an avid reader and a known poet and Popularly known as Sanyal Dr saab in the region.
